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मौत के मुख में भी वो वतन के दीवाने हँस रहे थे…

​जैसे-जैसे कदम उनका जहाँ-जहाँ पर बढ़ता था।
इंकलाब के शोर से अंग्रेजों का दिल कँपता था ॥
कैदी न कोई कैदी रहा इंकलाब तब सबने कहा,
भय से तब अंग्रेजों का कदम-कदम बहकता था॥

एक भी बूँद न उनके आँसू एक पल को भी छलका।
पर उस पल अंग्रेजों का पसीना टप-टप था टपका॥
मौत के मुख में भी वो वतन के दीवाने हँस रहे थे,
पर तब भी अंग्रेजों का दिल बड़ी जोर-जोर से था धड़का॥

जब लाहौर में उस दिन का सूरज डूब रहा था।
इंकलाब के नारे से तब पूरा शहर गूँज रहा था॥
तीन सितारों से सतलुज किनारा चमक उठा था,
और अंग्रेजों का भय से पल-पल कंठ सूख रहा था॥

सोचा था शवों को सतलुज किनारे जला दिया। 
और इस बढ़ते जनद्रोह को उन्होंने दबा दिया ॥
पर उन्हें क्या पता था कि पैर पर कुल्हाडी मार ली;
और अपने विनाश का रास्ता खुद उन्होंने बना दिया॥

कवि – अमित चन्द्रवंशी 

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मातृभाषा का सम्मान

आज के समय में हिन्दी भाषा की हालत इतनी खराब हो गई है कि यदि किसी हिन्दी मातृभाषी से कभी हिन्दी लिखवाई जाए तो बहुत ही कम लोग शुद्ध हिन्दी लिख पायेंगे। शुद्ध लिखने की बात भी छोड़ दीजिए वो हिन्दी भी लिखने में बगले झाँकते दिखेंगे।तब स्वामी विवेकानंद जी की एक यात्रा का वृतांत याद आता है।

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मेरा भारत आज तक उन्हें नम आँखों से ढूँढता है(मुक्तक)

मेरा भारत आज तक उन्हें नम आँखों से ढूँढता है।
जिनका नारा आज भी दिलों दिमाग में गूँजता है॥
वो ‘दिल्ली चलो’ बोलकर ‘हिन्द फौज’ भेज गए,
पर आप कहाँ रह गए ये आज पूरा भारत पूछता है॥

कवि – अमित चन्द्रवंशी

दहेज प्रथा की वास्तविकता(Reality of Dowry System)

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वास्तव में दहेज प्रथा क्या थी और अब उसको क्या माना जा रहा है जिसकी वजह से आज इसको एक कुरीति के रूप में घोषित किया जा रहा है।जिसने आज एक घर की बेटी व उसके परिवारजनों का कितना कष्ट दिया है उसका वर्णन नहीं किया जा सकता।यह दहेज प्रथा वह शूल बन गई है जो समाज के अंग से निकलने का नाम नहीं ले रही है व हरदम टीस दे रही है।

दहेज प्रथा ने एक लड़की को बोझ बना दिया है जिसने प्राथमिक रूप से सर्वप्रथम परिवारजनों को एक कन्या के जन्म लेते ही मानसिक रूपी अनावश्यक कष्ट दिया है और फिर उसके बाद लड़की के लिए असहय कष्ट। जो कभी कभी लड़कियों के लिए प्राणघातक तक बन गया है या जिसने लड़कियों को घुट-घुटकर रहने पर विवश कर दिया है।

परंतु मूल रूप से यह दहेज प्रथा इतनी भयावह नहीं थी जितनी यह आज दिखती है। बल्कि इसके ठीक विपरीत यह वह प्रथा थी, जो एक नवविवाहित युवती के लिए अपार सुख देने वाली थी और उसके माता-पिता को आश्वस्त करती थी कि उनकी बेटी जहाँ भी रहेगी वहाँ सुखी ही रहेगी।

दहेज प्रथा वो प्रथा थी जिसमें अपने दिल के टुकड़े को दूर होने के डर से माता-पिता प्रेमवश होकर प्यार को लुटाने वाले हाथों से स्नेहपूर्वक वह सामग्रियाँ प्रदान करते थे जो उनकी प्रिय बेटी को अधिक प्रिय होता था और अन्य सुख सुविधाओं की वस्तुएँ प्रदान करते थे ताकि उनकी बेटी आराम से रहे।आप जानते होंगे कि जब किसी राजकुमारी की विदाई होती थी तब एक राजा अपनी प्यारी बेटी के साथ अपनी बेटी की प्रिय दासियाँ भी साथ में भेज देते थे ताकि उनकी बेटी को ज्यादा असहज नहीं लगे और वे दासियाँ उनकी बेटी का अच्छे से ध्यान रख सकें।

परंतु जैसे-जैसे समय बीतता गया, दहेज प्रथा में बदलाव आते गये। परंतु वर्तमान समय में इसका स्वरूप इस प्रकार से बदल गया है कि अब वर पक्ष दहेज को लेना अपना अधिकार ही मानने लगे हैं जो बिल्कुल भी उचित नहीं है।

दहेज प्रथा का बदल जाना इतना चिंताजनक नहीं है जितना दहेज प्रथा के संदर्भ में विचारधारा का परिवर्तन होना है ।जिसका दंश बेटियों के लिए कष्टदायक बन गया है।

अतः वर पक्ष से यही निवेदन है कि दहेज को अपना अधिकार न समझें अपितु दहेज प्रथा को समझते हुए एक बेटी का सम्मान करें और एक बेटी को यथासंभव सुख सुविधाएँ देने का प्रयास करें ताकि उसे दूसरा घर दूसरा न लगे बल्कि उसे अपना घर लगे।जहाँ वो अपना सम्पूर्ण जीवन व्यतीत कर सके।

मुझे उम्मीद है कि आप दहेज प्रथा का वास्तविक अर्थ समझ गये होंगे।

लेखक अमित चन्द्रवंशी

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