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मौत के मुख में भी वो वतन के दीवाने हँस रहे थे…

​जैसे-जैसे कदम उनका जहाँ-जहाँ पर बढ़ता था।
इंकलाब के शोर से अंग्रेजों का दिल कँपता था ॥
कैदी न कोई कैदी रहा इंकलाब तब सबने कहा,
भय से तब अंग्रेजों का कदम-कदम बहकता था॥

एक भी बूँद न उनके आँसू एक पल को भी छलका।
पर उस पल अंग्रेजों का पसीना टप-टप था टपका॥
मौत के मुख में भी वो वतन के दीवाने हँस रहे थे,
पर तब भी अंग्रेजों का दिल बड़ी जोर-जोर से था धड़का॥

जब लाहौर में उस दिन का सूरज डूब रहा था।
इंकलाब के नारे से तब पूरा शहर गूँज रहा था॥
तीन सितारों से सतलुज किनारा चमक उठा था,
और अंग्रेजों का भय से पल-पल कंठ सूख रहा था॥

सोचा था शवों को सतलुज किनारे जला दिया। 
और इस बढ़ते जनद्रोह को उन्होंने दबा दिया ॥
पर उन्हें क्या पता था कि पैर पर कुल्हाडी मार ली;
और अपने विनाश का रास्ता खुद उन्होंने बना दिया॥

कवि – अमित चन्द्रवंशी 

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वो नाराज है मुझसे…

आज न जाने कितने बरसों के बाद,
कुछ लिखने का ख्याल आया अकस्मात।
तब मेरे कदम गए उस मेज की ओर,
जहाँ रचनाओं की नित होती थी भोर।
पर जब गया मैं उस मेज पर,
तब वो मेज बोली बड़ी चिढ़कर।
हम रोज तिल तिल कर अपमानित होते रहे हैं,
और तुम्हारी उपेक्षा भरी निगाहों से खोते रहे हैं।
एक बार तो कम से कम हाल पूछ लेते हमारा,
न रोज न महीने में बस एक साल में सारा।

तब लगा मेरे दिल को कि वो नाराज है मुझसे।
इतना कि अब तो बात नहीं हो सकती उससे॥

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आजकल के बच्चे(कविता)

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आजकल के बच्चों को नहीं चाहिए खिलौने।
हो गए हैं वो आजकल बहुत ज्यादा ही सयाने॥

वो बात हुई पुरानी जो बच्चों की जिद थी अनूठी।
अब तो ऐसी-ऐसी जिदे हैं जो न हो सके झूठी॥

पहले कहता था बच्चा चाँद मुझे ला दो।
अब कहता है मुझे iPhone 7 दिला दो॥

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