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योग पर नारे (Slogans on Yoga)

​1.जो चाहते हो तुम रोगों से छुटकारा।
तो लो नियमित योग का सहारा॥

2.योग है स्वस्थ जीवन पहचान।
नियमित योग से रोग निदान ॥

3.जब भी मिले मौका कर लो योग।
फिर देखो कैसे भागे रोग॥

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मैं उस कर्म की बात करूँगा… (मुक्तक)

न जात की बात करूँगा, न धर्म की बात करूँगा ।
न गर्व की बात करूँगा, न शर्म की बात करूँगा॥
इंसान होने का वो महान फर्ज बस तुम अदा कर दो,
ला दे जो दुनिया में खुशी, मैं उस कर्म की बात करूँगा ॥

कवि – अमित चन्द्रवंशी

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गुरु (दोहा)

धाकड़ अमित दोहा :

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गुरु बिन ज्ञान शून्य जगत,गुरु विश्व ज्ञानखान।
असंभव से संभव सब, पाया जो गुरु ज्ञान॥

कवि – अमित चन्द्रवंशी

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योग (कविता)

योग पर विशेष 


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धाकड़ अमित का भोपाली अंदाज

:

मुक्तक

बिन खर्चे एक रुपिया ।

कह  दो तुम  शुक्रिया ॥

योग से मिटे सब रोग,

तो तू क्यों न कर रिया॥

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नव वर्ष संदेश

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नया वर्ष शुरू हो गया है और क्या आप हर बार यूँ ही नव वर्ष मनाओगे? 
   मैं आपको मात्र विक्रम संवत् २०७२ के नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ ही दे सकता हूँ क्योंकि बधाई तो तब देता जब नव वर्ष की शुरुआत बड़े ही उत्तम ढंग से हुई होती ।परन्तु नव चेतना, नव उल्लास, नव समय इत्यादि को लाने वाला जब असमय ही ओलावृष्टि के साथ कष्टदायक पीड़ा को लेकर आगमन करे तब कदाचित आप इसे सुखद नहीं कह सकते । नव वर्ष सदैव खुशियों को लाने वाला है पर उसके रंग में भंग उत्पन्न करके आपने सारा स्वरूप बिगाड़ दिया है । अब जिम्मेदारी आपकी ही है कि इस शुभ अवसर पर संकल्प लें और इस संसार के विनाश के कारकों को ठीक उसी प्रकार निकाल फेंकिए जिस प्रकार एक तपस्वी संसार की मोह माया को निकाल फेंकता है । 
      आपके पापों का फल अकेले अन्नदाता ही को क्यों चुकाना पड़े । आप पर तो ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ेगा परंतु जिसने दिन रात मेहनत की है उसके हृदय का हाल तो पूछिए, मानो मंदराचल के शिखर से उसके उर को विदीर्ण कर दिया गया हो । लेकिन अभी नहीं तो शीघ्र ही आपको इसका परिणाम भुगतना होगा । प्रदुषण को बढ़ाने के आप वो सारे कृत कर रहे हो जिन्हे आप को नहीं करना चाहिए था बल्कि आप को वृक्षों को अधिक से अधिक संख्या में लगाना चाहिए था पर आप तो इसके विपरीत कर्म कर रहे हो।
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मैं घर पर सूरज नहीं देखता (कविता)

कविता

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मैं घर पर सूरज नहीं देखता।
यह मत समझना , मैं देख नहीं सकता ॥
या फिर घर से सूरज नहीं दिखता ।
समय का अभाव है मुझसे कहता ॥
कि घर से तू सूरज देख नहीं सकता ॥1॥

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