नवोदय चालीसा

॥श्री गणेशाय नमः॥

दोहे:

सपना था राजीव का, बने एक संस्थान।
प्रतिभावान छात्रजन, पायें जिसमें ज्ञान॥1॥
शिक्षा पायें यहाँ पर, गुणी बालक गरीब।
बच्चें रक्षा कर सकें, बन भारत की नींव ॥2॥

चौपाई :

हर बच्चा शिक्षित जब होगा।
भारत विकसित तब ही होगा॥1॥
भारत तब नवोदय करेगा ।
जब हर ईक बच्चा पढ़ेगा ॥2॥

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दहेज प्रथा पर नारे ( Slogans on Dowry System)

​1.जब तक रहेगी दहेज प्रथा, बेटी रहेगी दुखी सदा।

2.बेटी कोई वस्तु नहीं, दहेज से जो बिक रही।

3.शादी तो एक बहाना है, दहेज लेकर आना है।

4.अनमोल से भी अनमोल है बेटी, फिर उसे दहेज से क्यों बेची।

5.दहेज प्रथा ने जुल्म किया, बेटी को बोझ बना दिया।

रचनाकार – अमित चन्द्रवंशी

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वानर जाति भी हुई महान…

हनुमानजी के जीवन से हमें बहुत कुछ सीखने को मिलता है, पर कुछ इतनी विशेष बातें हमें सीखने को मिलती हैं।जो हमें हमेशा आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती हैं और हमारे आत्मविश्वास को सदैव बनाए रखती हैं । 
हनुमानजी ने वानर रूप में जन्म लिया था और उस वानर को नीच जाति का प्राणी माना गया है जैसा तुलसीदास जी ने भी एक चौपाई के द्वारा बताया है कि-

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एक आदर्श समाज

​व्यक्तियों के समूह को मिलाकर एक परिवार बनता है और उन परिवारों से मिलकर एक समाज बनता है और उन समाजों से मिलकर एक राज्य बनता है और उन राज्यों के मिलने से एक राष्ट्र बनता है और उन राष्ट्रों के मिलने से एक विश्व का निर्माण होता है।
समाज उन व्यक्तियों के समूह को दर्शाता है जो एक साथ रहते हैं अर्थात् समाज को यदि परिभाषित करने की कोशिश की जाए तो इससे यह आशय निकलेगा कि एक दल या समुदाय जो किसी विशेष स्थान पर रहता है (एक स्थान पर रहने वाले लोगों का वर्ग या समुदाय है) और अपने आप में एक संस्कृति को संजोये रखता है।

समाज तो वो एक माला है जिसके परिवार रूपी मनोहर मोती हैं और परिवार के सदस्य उस मोती की सुंदरता है।

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शिवद्रोही राम जी का सेवक नहीं हो सकता (भगवान को लेकर लड़ाई क्यों???)

आज संसार में सभी अपने धर्म को श्रेष्ठ बताने से पीछे नहीं हटते और इसी वजह से कई लड़ाईयाँ हुईं हैं ।
 यदि आपको सभी धर्मों को भी छोड़ दो तो अकेले सनातन धर्म में ही इतने भगवान और देवी-देवता हैं कि लोगों ने अपनी श्रद्धानुसार किन्हीं भगवान को मन ही मन अपना ईष्ट मान लिया है और जब भी सनातन धर्मियों में भगवान की बात छिड़ती है तो वो अपने ईष्ट देव को बड़ा बताने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाते हैं ।
 तब बात यही होती है कि कौनसे भगवान श्रेष्ठ  (बड़े) हैं ? और यह श्रेष्ठता का फेर ही लड़ाई का कारण बन जाता है ।

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मौत के मुख में भी वो वतन के दीवाने हँस रहे थे…

​जैसे-जैसे कदम उनका जहाँ-जहाँ पर बढ़ता था।
इंकलाब के शोर से अंग्रेजों का दिल कँपता था ॥
कैदी न कोई कैदी रहा इंकलाब तब सबने कहा,
भय से तब अंग्रेजों का कदम-कदम बहकता था॥

एक भी बूँद न उनके आँसू एक पल को भी छलका।
पर उस पल अंग्रेजों का पसीना टप-टप था टपका॥
मौत के मुख में भी वो वतन के दीवाने हँस रहे थे,
पर तब भी अंग्रेजों का दिल बड़ी जोर-जोर से था धड़का॥

जब लाहौर में उस दिन का सूरज डूब रहा था।
इंकलाब के नारे से तब पूरा शहर गूँज रहा था॥
तीन सितारों से सतलुज किनारा चमक उठा था,
और अंग्रेजों का भय से पल-पल कंठ सूख रहा था॥

सोचा था शवों को सतलुज किनारे जला दिया। 
और इस बढ़ते जनद्रोह को उन्होंने दबा दिया ॥
पर उन्हें क्या पता था कि पैर पर कुल्हाडी मार ली;
और अपने विनाश का रास्ता खुद उन्होंने बना दिया॥

कवि – अमित चन्द्रवंशी 

वो नाराज है मुझसे…

आज न जाने कितने बरसों के बाद,
कुछ लिखने का ख्याल आया अकस्मात।
तब मेरे कदम गए उस मेज की ओर,
जहाँ रचनाओं की नित होती थी भोर।
पर जब गया मैं उस मेज पर,
तब वो मेज बोली बड़ी चिढ़कर।
हम रोज तिल तिल कर अपमानित होते रहे हैं,
और तुम्हारी उपेक्षा भरी निगाहों से खोते रहे हैं।
एक बार तो कम से कम हाल पूछ लेते हमारा,
न रोज न महीने में बस एक साल में सारा।

तब लगा मेरे दिल को कि वो नाराज है मुझसे।
इतना कि अब तो बात नहीं हो सकती उससे॥

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