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सूखा पेड़ (कुण्डलिया)

कुण्डलिया :

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खड़ा हुआ था मुस्कराता, हरा भरा वो पेड़।
गंजा मालूम वो पड़े, किसने की ये छेड़॥
किसने की ये छेड़, महंगी बहुत पड़ेगी।
जो सजा दीन आज, उससे बदतर मिलेगी॥
कहे ‘अमित‘ कविराय, बिन पेड़ जीवन उखड़ा।
तरु है धरा जान, न त मौत द्वार तू खड़ा॥

कविअमित चन्द्रवंशी

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बेचारा रावण(कुण्डलिया)

धाकड़ अमित कुण्डलिया :

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रावण का क्या हाल था, कैसे वो बतलाय।
सब कहते थे राम भज,अपना कोइ न पाय॥
अपना कोइ न पाय,तब सब को वो डराता।
बताये नीति  बात , अरु वीरों को लड़ाता॥
कहे ‘अमित‘ कविराय,वीरों का था बहाना।
रावण से तो दूर, शुभ राम हाथ मर जाना॥

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