शिवद्रोही राम जी का सेवक नहीं हो सकता (भगवान को लेकर लड़ाई क्यों???)

आज संसार में सभी अपने धर्म को श्रेष्ठ बताने से पीछे नहीं हटते और इसी वजह से कई लड़ाईयाँ हुईं हैं ।
 यदि आपको सभी धर्मों को भी छोड़ दो तो अकेले सनातन धर्म में ही इतने भगवान और देवी-देवता हैं कि लोगों ने अपनी श्रद्धानुसार किन्हीं भगवान को मन ही मन अपना ईष्ट मान लिया है और जब भी सनातन धर्मियों में भगवान की बात छिड़ती है तो वो अपने ईष्ट देव को बड़ा बताने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाते हैं ।
 तब बात यही होती है कि कौनसे भगवान श्रेष्ठ  (बड़े) हैं ? और यह श्रेष्ठता का फेर ही लड़ाई का कारण बन जाता है ।

 

पर भगवान तो निराकार हैं उनके साकार होने पर ही हमें कई रूप दिखते हैं और इन्हीं रूपों को हम अलग-अलग भगवान मानके पूजते हैं ।
  और तुलसीदास जी ने बड़े ही सुंदर तरीके से हम भक्तों को याद दिलाया है कि भगवान में अंतर करने पर आपको कभी फल की प्राप्ति नहीं होगी बल्कि इसके विपरीत आपको फल मिलेगा।
 तुलसीदास जी रामचरितमानस के लंका काण्ड में बताते हैं श्री राम जी शिवलिंग(रामेश्वरम्) की स्थापना करते हुए कहते हैं कि

शंकरप्रिय मम द्रोही, शिव द्रोही मम दास।
ते नर करहि कल्प भरि, घोर नरक महुँ बास॥


– श्री राम उवाच (रामचरितमानस 6.2)

[अर्थात् जिनको शंकर जी प्रिय हैं परन्तु जो मेरे द्रोही हैं एवं जो शिवजी के द्रोही हैं और मेरे दास {बनना चाहते } हैं,  वे मनुष्य कल्पभर घोर नरक में निवास करते हैं ।]

 इससे यह सिद्ध होता है कि आपको भगवान में अंतर नहीं करना चाहिए।जब भगवान ही खुद कह रहे हैं कि वो एक दूसरे के पूरक हैं अर्थात् एक दूसरे के बिना वो अधूरे हैं तो फिर आप उनको अलग-अलग मान कर क्यों लड़ रहे हो?😉
तब हम कैसे कह सकते हैं कि दोनों में से कौन श्रेष्ठ है। जब वो ही एक दूसरे को पूरक मानते हैं।
  वेदों में भी उल्लेख मिलता है कि शिवजी राम नाम का जाप करते हैं और राम जी मन ही मन शिव जी के नाम का जाप करते हैं।
   अब आपको समझ जाना चाहिए कि लड़ाई किस बात की है – आपके श्रद्धा भाव की। आप जिसको पूजोगे वास्तव में वो ही श्रेष्ठ हैं क्योंकि आपने उसी रूप का ध्यान किया है जिस रूप की आपको जरूरत थी। यही तो हैं आपके निराकार से साकार बने भगवान। अतएव यही हुआ कि अपने मन में आप जिस भाव को लाओगे। वही आपके लिए पूज्यनीय होंगे और वही आपको दिखेंगे।

किसी भी युग में देखिए जब भी किसी भगवान के अंश रूप का अवतार किसी प्रयोजन हेतु होता है तब सभी देवी-देवता किसी न किसी रूप में अवतार अवश्य लेते हैं और एक दूसरे का सहयोग करके संसार का उत्थान करते हैं। ठीक उसी प्रकार जैसे निराकार से साकार रूप में आते हैं ।

आपको अब मान लेना चाहिए कि भगवान तो एक ही है जो निराकार रूप में हैं और जब आप जिस भक्ति भाव से उन्हें याद करोगे तो वो आपको उसी रूप में दर्शन देंगे तो फिर लड़ाई किस बात की। यदि आप तब भी धर्म या पंथ या अवतार के आधार पर लड़ते हैं तो आप अपने उसी भगवान का अपमान कर रहे हैं जिनको आप हृदय में रखकर हर पल जाप करते हो।
तो आप निश्चय कर लीजिए कि अब आपको क्या करना है???😑
 
लेखक – अमित चन्द्रवंशी

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