श्रीराम जी भी मनाते थे दीपावली

दीपावली मनाने के पीछे बदलते समय के साथ सभी के अलग-अलग मत(विचार) हैं और हो भी क्यों नहीं? क्योंकि दीपावली का प्रतीक है ही ऐसा…

दीपावली प्रतीक है‘ जानने के लिए click करें

दीपावली को मनाने के लिए कथाएँ तो बहुत मिलती हैं और अधिकांश यही मानते हैं कि दीपावली के दिन श्रीराम जी लंका के अत्याचारी राजा रावण का वध करके अयोध्या वापस लौटे थे, अतः उनके अयोध्या लौटकर आने की खुशी में दीपावली का त्योहार मनाने की शुरूआत हुई थी परन्तु आपको यह जानकर अचरज होगा कि दीपोत्सव तो पहले से ही मनाया जा रहा था और जिसे स्वयं श्रीराम भगवान भी मनाते थे और उस दिन भी मनाया गया था।

तो हम आपको बता दें कि श्रीराम जी से जुड़ी हर कथा के लिए आदिकवि वाल्मीकि जी की रामायण को मुख्य स्त्रोत माना जाता है। जिसे सत्य और प्रमाणित माना जाता है तथा उन्हीं के द्वारा रचित आनंदरामायण के सारकाण्ड के चौथे सर्ग के 3 से 19 श्लोक तक वर्णन मिलता है कि

राजा जनक राजा दशरथ को सकुटुम्ब, मंत्रियों, पुरवासियों तथा देशवासियों सहित दीपावली के महोत्सव पर बुलाते हैं। जो इस बात की पुष्टि करता है कि दीपोत्सव के महापुण्य से राजा बलि का राज्य आरंभ हुआ था।

अब दीपोत्सव के महापुण्य से राजा बलि का राज्य आरंभ कैसे हुआ?

बात उस समय की है जब भगवान विष्णु ने राजा बलि के यज्ञ में जाकर उसे वचनबद्ध करके तीन पग भूमि दान में माँग ली । तत्पश्चात अपने विराट रूप से पहले पग में सारी पृथ्वी को नापा, दूसरे पग में अंतरिक्ष और  तीसरे पग के लिए जब बलि से पूछा तो उसने अपना सिर पर पग रखने कहा। तब उसकी दानशीलता से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु जी ने उससे वर माँगने को कहा। राजा बलि बोला – “हे प्रभु! कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी से अमावस्या तक अर्थात् दीपावली तक इस धरती पर मेरा राज्य रहे। इन तीन दिनों तक सभी लोग दीप-दान कर लक्ष्मी जी की पूजा करें और कर्ता के गृह में लक्ष्मी जी का वास हो।”
राजा बलि को याचित वर देकर उसे पातालपुरी का राज्य देकर पाताल भेज दिया और बंदी बने सभी देवताओं को कारागार से मुक्त कर दिया । कारागार से मुक्त होकर सभी प्रमुख देवों ने क्षीरसागर में लक्ष्मी सहित विश्राम किया। इसी कारण लक्ष्मी पूजन के साथ साथ अन्य देवताओं के भी पूजन एवं नयन की व्यवस्था की जाती है।
इस प्रकार भगवान विष्णु ने वामन रूप में महादानी राजा बलि के दान की परीक्षा ली थी और राजा बलि से प्रसन्न होकर उसके राज्य का रक्षण करने के लिए भगवान विष्णु ने भी राजा बलि का द्वारपाल बनना स्वीकार कर लिया था। उन्होंने राजा की धर्मनिष्ठा स्मृति को बनाए रखने के लिए तीन दिन अहोरात्रि महोत्सव का निश्चय किया था। यही महोत्सव आज दीपमालिका (दीपावली) के नाम से प्रसिद्ध है।

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