बेचारा रावण(कुण्डलिया)

धाकड़ अमित कुण्डलिया :

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रावण का क्या हाल था, कैसे वो बतलाय।
सब कहते थे राम भज,अपना कोइ न पाय॥
अपना कोइ न पाय,तब सब को वो डराता।
बताये नीति  बात , अरु वीरों को लड़ाता॥
कहे ‘अमित‘ कविराय,वीरों का था बहाना।
रावण से तो दूर, शुभ राम हाथ मर जाना॥

रावण भी मन में कहे , मैं भी भज  लूँ राम ।
पर निकल नहिं पाता था,पापी मुख से नाम॥
पापी  मुख  से नाम,  कैसे  रसना¹  उचारे² ।
जो  कहे  कोई  राम , तो  भड़कावे  अंगारे॥
कहे ‘अमित‘ कविराय,कह कर राम वनवासी।
करता सबको मौन, नाम  लेता  अभिलाषी॥

कलयुग सा युग देखकर, रावण करे पुकार।
मानव का एक सिर है, फिर भी दिखें हजार॥
फिर भी दिखें हजार, कर  लेते  भिन्न  बातें।
कहता था एक बात, भले दस मुख थे भाते॥
कहे ‘अमित‘ कविराय,कलयुग से वो घबराता।
हो रहा है बदनाम , किन किन मुख बतलाता॥

1.जिह्वा,जीभ; 2. कहे,बोले;

रचयिताअमित चन्द्रवंशी 

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