मुक्तछंद स्वतंत्रता दिवस कविता

Independence day poem

Indian Flag

स्वतंत्रता दिवस मना आप हर साल रहे।
और स्वतंत्रता का गलत मतलब निकाल रहे॥

जनाब क्यों तुम अब इतने स्वतंत्र हो रहे।
कि जो मन में आयेगा वही बीज बो रहे ॥

स्वतंत्रता नाम की मशाल लोगों को दिखा रहे।
और उसमें बुरे कर्मों से आग लगा रहे ॥

केवल अपने मतलब के पीछे ही बुरे काज कर रहे ।
और बिना जलाये ही सबको भस्म आज कर रहे॥

भलाई का न आज तुम कोई काम कर रहे ।
अपने ही लोगों का आज तुम खून कर रहे॥

बदले की आग आज इतनी भड़का रहे।
कि उससे हर एक घरों को जला रहे ॥

भ्रष्टाचार की तलवार भी खूब चला रहे ।
और लोगों को घायल कर खून बहा रहे॥

घोटालों का ऐसा अंधाधुँध चक्र चला रहे।
उससे सभी को बिन देखे ही कुचले जा रहे ॥

वार अत्याचारों का ऐसा कर बेरहम रहे ।
बिना घाव ही तुम बड़ा दर्द दे हर दम रहे ॥

भुखमरी का ऐसा काल फैलाये जा रहे ।
बिना खाये ही लोगों को कच्चा खा रहे ॥

बेईमानी का जहर चारों ओर घोले जा रहे।
बिना जल के लोगों की जिंदगी ढुबा रहे ॥

मन को कर गुलाम क्यों अत्याचार कर रहे।
और गुलामी की जंजीर आप तैयार कर रहे ॥

बुरे कर्मों का तुम ऐसा जाल बना रहे।
आजादी का पर्दा ओढ बुरे फँसे जा रहे॥

कवि – अमित चन्द्रवंशी

Also read this poem in Hinglish

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