मैं घर पर सूरज नहीं देखता (कविता)

कविता

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मैं घर पर सूरज नहीं देखता।
यह मत समझना , मैं देख नहीं सकता ॥
या फिर घर से सूरज नहीं दिखता ।
समय का अभाव है मुझसे कहता ॥
कि घर से तू सूरज देख नहीं सकता ॥1॥

न मैं कोई अंधा , न कोई बेपरवाह हूँ ।
मैं तो केवल समय का बुरा मारा हूँ ॥
सूरज के उदय से अस्त तक घर से बाहर हूँ।
न पल दो पल का आराम ले पाता हूँ ॥
मैं तो केवल थका हारा ही रह जाता हूँ ॥2॥

आज का जीवन इतना व्यस्त हो गया।
कोई न पल दो पल के लिए खाली रह गया ॥
आज मैं कामकाजों में इतना दब गया।
न खुद की सुध , न दूसरों का ख्याल रह गया ॥
केवल मैं एक कठपुतली बन कर रह गया ॥3॥

आज मोह माया जग में इतनी व्याप्त हो गई ।
न किसी की दुख तकलीफ सुनवाई रह गई ॥
जिंदगी की डोर जग में ऐसी फँस कर रह गई ।
हर किसी की लालसा दिल में ही रह गई ॥
घूमते फिरते ही दुनिया से अर्थी उठ गई ॥4॥

कवि – अमित चन्द्रवंशी

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