भ्रष्टाचार (छंद)

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भ्रष्ट आचरण आवरण ओढ जन सब बने भले ।

कर भ्रष्टाचार की जय जयकार हर ईमान मले ॥

देख हर दिशि भ्रष्टतंत्रस्वरूप भ्रष्ट मंत्र सब कहे ।

तज ईमान बन बेईमान भ्रष्टाचार सब जप रहे ॥

चली जो पवन कर अच्छाई शमन भ्रष्ट कण – कण करे।

जेहि धन समृद्ध तेहि जन समृद्ध हर दुख भ्रष्टास्त्र हरे॥

जे नहिं बुराई हानि काज जो होत बिन कठिनाई ।

ते करहि भलाई मिलहि खटाई बरनि न कबहु जाई॥

कवि – अमित चन्द्रवंशी

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